क़ुरआनी दुआएँ

क़ुरआन में सुरक्षा की दुआएँ

क़ुरआन ईमान वालों को नुक़सान, शैतानों की उकसाहटों और ज़ुल्म से अल्लाह की पनाह माँगना सिखाता है। आख़िरी दो सूरहें, अल-फ़लक़ और अन-नास, ख़ुद पनाह माँगने के शब्द हैं।

मैं सुबह के रब की पनाह माँगता हूँ

सूरह अल-फ़लक़, जिसमें उसकी पैदा की हुई चीज़ों की बुराई, अंधेरे, जादू और हसद से पनाह माँगी गई है। (Al-Falaq 113:1–5)

113:1पृष्ठ 604 · जुज़ 30

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلْفَلَقِ ۝١

(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के पालनहार की शरण लेता हूँ।

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मेरा चिंतन
113:2पृष्ठ 604 · जुज़ 30

مِن شَرِّ مَا خَلَقَ ۝٢

उस चीज़ की बुराई से, जो उसने पैदा की।

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मेरा चिंतन
113:3पृष्ठ 604 · जुज़ 30

وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ ۝٣

तथा अंधेरी रात की बुराई से, जब वह छा जाए।[1]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[1] (1-3) इनमें संबोधित तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को किया गया है, परंतु आपके माध्यम से पूरे मुसलमानों के लिए संबोधन है। शरण माँगने के लिए तीन बातें ज़रूरी हैं : (1) शरण माँगाना। (2) जो शरण माँगता हो। (3) जिसके भय से शरण माँगी जाती हो और अपने को उससे बचाने के लिए दूसरे की सुरक्षा और शरण में जाना चाहता हो। फिर शरण वही माँगता है, जो यह सोचता है कि वह स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता। और अपनी रक्षा के लिए वह ऐसे व्यक्ति या अस्तित्व की शरण लेता है जिसके बारे में उसका विश्वास होता है कि वह उसकी रक्षा कर सकता है। अब स्वभाविक नियमानुसार इस संसार में सुरक्षा किसी वस्तु या व्यक्ति से प्राप्त की जाती है, जैसे धूप से बचने के लिये पेड़ या भवन आदि की। परंतु एक खतरा वह भी होता है जिससे रक्षा के लिए किसी अनदेखी शक्ति से शरण माँगी जाती है, जो इस विश्व पर राज करती है। और वह उसकी रक्षा अवश्य कर सकती है। यही दूसरे प्रकार की शरण है, जो इन दोनों सूरतों में अभिप्रेत है। और क़ुरआन में जहाँ भी अल्लाह की शरण लेने की चर्चा है उसका अर्थ यही विशेष प्रकार की शरण है। और यह तौह़ीद पर विश्वास का अंश है। ऐसे ही शरण के लिए विश्वासहीन देवी-देवताओं इत्यादि को पुकारना शिर्क और घोर पापा है।
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मेरा चिंतन
113:4पृष्ठ 604 · जुज़ 30

وَمِن شَرِّ ٱلنَّفَّـٰثَـٰتِ فِى ٱلْعُقَدِ ۝٤

तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से।

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मेरा चिंतन
113:5पृष्ठ 604 · जुज़ 30

وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ ۝٥

तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।[2]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[2] (4-5) इन दोनों आयतों में जादू और हसद (ईर्ष्या) की बुराई से अल्लाह की शरण में आने की शिक्षा दी गई है। और हसद ऐसा रोग है जो किसी व्यक्ति को दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए तैयार कर देता है। और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर भी जादू, हसद ही के कारण किया गया था। यहाँ ज्ञातव्य है कि इस्लाम ने जादू को अधर्म कहा है जिससे इनसान के परलोक का विनाश हो जाता है।
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मेरा चिंतन

मैं इंसानों के रब की पनाह माँगता हूँ

सूरह अन-नास, जिसमें वसवसा डालकर पीछे हट जाने वाले से पनाह माँगी गई है। (An-Nas 114:1–6)

114:1पृष्ठ 604 · जुज़ 30

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ ۝١

(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं शरण लेता हूँ लोगों के पालनहार की।

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मेरा चिंतन
114:2पृष्ठ 604 · जुज़ 30

مَلِكِ ٱلنَّاسِ ۝٢

लोगों के बादशाह की।

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मेरा चिंतन
114:3पृष्ठ 604 · जुज़ 30

إِلَـٰهِ ٱلنَّاسِ ۝٣

लोगों के सत्य पूज्य की।[1]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[1] (1-3) यहाँ अल्लाह को उसके तीन गुणों के साथ याद करके उसकी शरण लेने की शिक्षा दी गई है। एक उसका सब मानवजाति का पालनहार और स्वामी होना। दूसरे उसका सभी इनसानों का अधिपति और शासक होना। तीसरे उसका इनसानों का सत्य पूज्य होना। भावार्थ यह है कि (मैं) उस अल्लाह की शरण माँगता हूँ जो इनसानों का पालनहार, शासक और पूज्य होने के कारण उनपर पूरा नियंत्रण और अधिकार रखता है। जो वास्तव में, उस बुराई से इनसानों को बचा सकता है, जिससे वे स्वयं बचने और दूसरों को बचाने में अक्षम हैं, उसके सिवा कोई है भी नहीं जो शरण दे सकता हो।
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मेरा चिंतन
114:4पृष्ठ 604 · जुज़ 30

مِن شَرِّ ٱلْوَسْوَاسِ ٱلْخَنَّاسِ ۝٤

वसवसा डालने वाले, पीछे हट जाने वाले की बुराई से।

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मेरा चिंतन
114:5पृष्ठ 604 · जुज़ 30

ٱلَّذِى يُوَسْوِسُ فِى صُدُورِ ٱلنَّاسِ ۝٥

जो लोगों के दिलों में वसवसे डालता है।

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मेरा चिंतन
114:6पृष्ठ 604 · जुज़ 30

مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ ۝٦

जिन्नों और इनसानों में से।[2]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[2] (4-6) आयत संख्या 4 में 'वसवास' शब्द का प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ है दिलों में ऐसी बुरी बातें डाल देना कि जिसके दिल में डाली जा रही हों उसे उसका ज्ञान भी न हो। और इसी प्रकार आयत संख्या 4 में 'ख़न्नास' का शब्द प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ है सुकड़ जाना, छुप जाना, पीछे हट जाना, धीरे-धीरे किसी को बुराई के लिए तैयार करना आदि। अर्थात दिलों में भ्रम डालने वाला, और सत्य के विरुद्ध मन में बुरी भावनाएँ उत्पन्न करने वाला। चाहे वह जिन्नों में से हो, अथवा मनुष्यों में से हो। इन सब की बुराइयों से हम अल्लाह की शरण लेते हैं, जो हमारा स्वामी और सच्चा पूज्य है।
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मेरा चिंतन

मैं शैतानों की उकसाहटों से तेरी पनाह माँगता हूँ

नबी को इन शब्दों के साथ पनाह माँगने का आदेश दिया गया। (Al-Muminun 23:97–98)

23:97पृष्ठ 348 · जुज़ 18

وَقُل رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَٰتِ ٱلشَّيَـٰطِينِ ۝٩٧

तथा आप दुआ करें : ऐ मेरे पालनहार! मैं शैतानों की उकसाहटों से तेरी शरण चाहता हूँ।

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मेरा चिंतन
23:98पृष्ठ 348 · जुज़ 18

وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ ۝٩٨

तथा ऐ मेरे पालनहार! मैं इस बात से भी तेरी शरण माँगता हूँ कि वे मेरे पास आएँ।

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मेरा चिंतन

ऐ मेरे रब, मुझे ज़ालिम लोगों से बचा ले

मूसा ने डर की हालत में मिस्र छोड़ते समय यह कहा। (Al-Qasas 28:21)

28:21पृष्ठ 387 · जुज़ 20

فَخَرَجَ مِنْهَا خَآئِفًا يَتَرَقَّبُ ۖ قَالَ رَبِّ نَجِّنِى مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ ۝٢١

तो वह डरता हुआ उस (शहर) से निकल पड़ा, इंतज़ार करता था (कि अब क्या होगा), उसने प्रार्थना की : ऐ मेरे पालनहार! मुझे इन ज़ालिम लोगों से बचा ले।

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मेरा चिंतन

मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना

फ़िरऔन की पत्नी की दुआ, जिसे ईमान वालों के लिए मिसाल के तौर पर पेश किया गया है। (At-Tahrim 66:11)

66:11पृष्ठ 561 · जुज़ 28

وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًا لِّلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱمْرَأَتَ فِرْعَوْنَ إِذْ قَالَتْ رَبِّ ٱبْنِ لِى عِندَكَ بَيْتًا فِى ٱلْجَنَّةِ وَنَجِّنِى مِن فِرْعَوْنَ وَعَمَلِهِۦ وَنَجِّنِى مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ ۝١١

तथा अल्लाह ने उन लोगों के लिए, जो ईमान लाए, फ़िरऔन की पत्नी का उदाहरण[10] दिया है। जब उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना तथा मुझे फ़िरऔन और उसके कर्म से बचा ले और मुझे अत्याचारी लोगों से छुटकारा दे।

अनुवाद टिप्पणियाँ
[10] ह़दीस में है कि पुरुषों में से बहुत-से पूर्ण हुए। परंतु स्त्रियों में से इमरान की पुत्री मरयम और फ़िरऔन की पत्नी आसिया ही पूर्ण हूईं। और आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की प्रधानता नारियों पर वही है जो सरीद (एक प्रकार का खाना) की सब खानों पर है। (सह़ीह़ बुख़ारी : 3411, सह़ीह़ मुस्लिम : 2431)
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मेरा चिंतन

हमें ज़ालिमों के लिए आज़माइश न बना

मूसा की क़ौम के शब्द, जिन्होंने अल्लाह पर भरोसा किया। (Yunus 10:85–86)

10:85पृष्ठ 218 · जुज़ 11

فَقَالُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ تَوَكَّلْنَا رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِّلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ ۝٨٥

तो उन्होंने कहा : हमने अल्लाह ही पर भरोसा किया है। ऐ हमारे पालनहार! हमें अत्याचारी लोगों के लिए आज़माइश न बना।

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मेरा चिंतन
10:86पृष्ठ 218 · जुज़ 11

وَنَجِّنَا بِرَحْمَتِكَ مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ ۝٨٦

और हमें काफ़िर लोगों से अपनी रहमत से नजात दे।

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मेरा चिंतन

हमें काफ़िरों के लिए आज़माइश न बना

इब्राहीम और उनके साथियों की दुआ का हिस्सा। (Al-Mumtahanah 60:5)

60:5पृष्ठ 549 · जुज़ 28

رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِّلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَٱغْفِرْ لَنَا رَبَّنَآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ۝٥

ऐ हमारे पालनहार! हमें काफ़िरों के लिए परीक्षण[3] न बना और ऐ हमारे पालनहार! हमें क्षमा कर दे। निश्चय तू ही प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है।

अनुवाद टिप्पणियाँ
[3] इस आयत में मक्का की विजय और अधिकांश मुश्रिकों के ईमान लाने की भविष्यवाणी है जो कुछ ही सप्ताह के पश्चात् पूरी हुई। और पूरा मक्का ईमान ले आया।
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मेरा चिंतन
पाठ स्रोत और सटीकता

मूल अरबी: Tanzil Uthmani v1.1. अर्थों का अनुवाद: Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari · QuranEnc.com · v1.1.5.

सभी 6,236 आयत संदर्भों को स्रोत से मिलाकर जाँचा गया है। यह तकनीकी अखंडता जाँच है, स्वतंत्र विद्वत समीक्षा नहीं। आरंभ की बिस्मिल्लाहें उसी रूप में सुरक्षित रखी गई हैं जिस रूप में मिली थीं।

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अनुवाद स्रोत

Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari
Translated by Azizul Haq Al-Omari.
स्रोत संस्करण: 1.1.5 · 2025-08-05

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