सूरह 88 · 26 आयतें · मक्की

Al-Ghaashiya

अल-ग़ाशिया

الغاشية
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88:1पृष्ठ 592 · जुज़ 30

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ٱلْغَـٰشِيَةِ ۝١

क्या तेरे पास ढाँपने लेने वाली (क़ियामत) की ख़बर पहुँची?

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मेरा चिंतन
88:2पृष्ठ 592 · जुज़ 30

وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ خَـٰشِعَةٌ ۝٢

उस दिन कई चेहरे अपमानित होंगे।

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मेरा चिंतन
88:3पृष्ठ 592 · जुज़ 30

عَامِلَةٌ نَّاصِبَةٌ ۝٣

कठिन परिश्रम करने वाले, थक जाने वाले।

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मेरा चिंतन
88:4पृष्ठ 592 · जुज़ 30

تَصْلَىٰ نَارًا حَامِيَةً ۝٤

वे गर्म धधकती आग में प्रवेश करेंगे।

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मेरा चिंतन
88:5पृष्ठ 592 · जुज़ 30

تُسْقَىٰ مِنْ عَيْنٍ ءَانِيَةٍ ۝٥

उन्हें खौलते सोते का जल पिलाया जाएगा।

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मेरा चिंतन
88:6पृष्ठ 592 · जुज़ 30

لَّيْسَ لَهُمْ طَعَامٌ إِلَّا مِن ضَرِيعٍ ۝٦

उनके लिए कांटेदार झाड़ के सिवा कोई खाना नहीं होगा।

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मेरा चिंतन
88:7पृष्ठ 592 · जुज़ 30

لَّا يُسْمِنُ وَلَا يُغْنِى مِن جُوعٍ ۝٧

जो न मोटा करेगा और न भूख मिटाएगा।[1]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[1] (1-7) इन आयतों में सबसे पहले सांसारिक स्वार्थ में मग्न इनसानों को एक प्रश्न द्वारा सावधान किया गया है कि उसे उस समय की सूचना है जब एक आपदा समस्त संसार पर छा जाएगी? फिर इसी के साथ यह विवरण भी दिया गया है कि उस समय इनसानों के दो भेद हो जाएँगे, और दोनों के प्रतिफल भी भिन्न होंगे : एक नरक में तथा दूसरा स्वर्ग में जाएगा। तीसरी आयत में "नासिबह" का शब्द आया है जिसका अर्थ है, थक कर चूर हो जाना, अर्थात काफ़िरों को क़ियामत के दिन इतनी कड़ी यातना दी जाएगी कि उनकी दशा बहुत ख़राब हो जाएगी। और वे थके-थके से दिखाई देंगे। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि उन्होंने संसार में बहुत-से कर्म किए होंगे, परंतु वे सत्य धर्म के अनुसार नहीं होंगे, इसलिए वे उपासना और कड़ी तपस्या करके भी नरक में जाएँगे। क्योंकि सत्य आस्था के बिना कोई कर्म मान्य नहीं होगा।
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मेरा चिंतन
88:8पृष्ठ 592 · जुज़ 30

وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ نَّاعِمَةٌ ۝٨

उस दिन कई चेहरे प्रफुल्लित होंगे।

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मेरा चिंतन
88:9पृष्ठ 592 · जुज़ 30

لِّسَعْيِهَا رَاضِيَةٌ ۝٩

अपने प्रयास पर प्रसन्न होंगे।

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मेरा चिंतन
88:10पृष्ठ 592 · जुज़ 30

فِى جَنَّةٍ عَالِيَةٍ ۝١٠

ऊँची जन्नत में होंगे।

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मेरा चिंतन
88:11पृष्ठ 592 · जुज़ 30

لَّا تَسْمَعُ فِيهَا لَـٰغِيَةً ۝١١

उसमें कोई बेकार (अशिष्ट) बात नहीं सुनेंगे।

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मेरा चिंतन
88:12पृष्ठ 592 · जुज़ 30

فِيهَا عَيْنٌ جَارِيَةٌ ۝١٢

उसमें बहने वाले स्रोत (चश्मे) हैं।

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मेरा चिंतन
88:13पृष्ठ 592 · जुज़ 30

فِيهَا سُرُرٌ مَّرْفُوعَةٌ ۝١٣

उसमें ऊँचे-ऊँचे तख्त हैं।

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मेरा चिंतन
88:14पृष्ठ 592 · जुज़ 30

وَأَكْوَابٌ مَّوْضُوعَةٌ ۝١٤

और (पीने वालों के लिए तैयार) रखे हुए प्याले हैं।

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मेरा चिंतन
88:15पृष्ठ 592 · जुज़ 30

وَنَمَارِقُ مَصْفُوفَةٌ ۝١٥

और क्रम में लगे हुए गाव-तकिए हैं।

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मेरा चिंतन
88:16पृष्ठ 592 · जुज़ 30

وَزَرَابِىُّ مَبْثُوثَةٌ ۝١٦

और बिछाए हुए क़ालीन हैं।[2]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[2] (8-16) इन आयतों में जो इस संसार में सत्य आस्था के साथ क़ुरआन आदेशानुसार जीवन व्यतीत कर रहे हैं परलोक में उनके सदा के सुख का दृश्य दिखाया गया है।
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मेरा चिंतन
88:17पृष्ठ 592 · जुज़ 30

أَفَلَا يَنظُرُونَ إِلَى ٱلْإِبِلِ كَيْفَ خُلِقَتْ ۝١٧

क्या वे ऊँटों को नहीं देखते कि वे कैसे पैदा किए गए हैं?

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88:18पृष्ठ 592 · जुज़ 30

وَإِلَى ٱلسَّمَآءِ كَيْفَ رُفِعَتْ ۝١٨

और आकाश को (नहीं देखते) कि उसे कैसे ऊँचा किया गया?

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मेरा चिंतन
88:19पृष्ठ 592 · जुज़ 30

وَإِلَى ٱلْجِبَالِ كَيْفَ نُصِبَتْ ۝١٩

और पर्वतों को (नहीं देखते) कि कैसे गाड़े गए हैं?

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मेरा चिंतन
88:20पृष्ठ 592 · जुज़ 30

وَإِلَى ٱلْأَرْضِ كَيْفَ سُطِحَتْ ۝٢٠

तथा धरती को (नहीं देखते) कि कैसे बिछाई गई है?[3]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[3] (17-20) इन आयतों में फिर विषय बदल कर एक प्रश्न किया जा रहा है कि जो क़ुरआन की शिक्षा तथा परलोक की सूचना को नहीं मानते, अपने सामने उन चीज़ों को नहीं देखते जो रात दिन उनके सामने आती रहती हैं, ऊँटों तथा पर्वतों और आकाश एवं धरती पर विचार क्यों नहीं करते कि क्या ये सब अपने आप पैदा हो गए हैं या इनका कोई रचयिता है? यह तो असंभव है कि रचना हो और रचयिता न हो। यदि मानते हैं कि किसी शक्ति ने इनको बनाया है जिसका कोई साझी नहीं तो उसके अकेले पूज्य होने और उसके फिर से पैदा करने की शक्ति और सामर्थ्य का क्यों इनकार करते हैं? (तर्जुमानुल क़ुरआन)
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88:21पृष्ठ 592 · जुज़ 30

فَذَكِّرْ إِنَّمَآ أَنتَ مُذَكِّرٌ ۝٢١

अतः आप नसीहत करें, आप केवल नसीहत करने वाले हैं।

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मेरा चिंतन
88:22पृष्ठ 592 · जुज़ 30

لَّسْتَ عَلَيْهِم بِمُصَيْطِرٍ ۝٢٢

आप उनपर कोई दरोग़ा (नियंत्रक) नहीं हैं।

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मेरा चिंतन
88:23पृष्ठ 592 · जुज़ 30

إِلَّا مَن تَوَلَّىٰ وَكَفَرَ ۝٢٣

परंतु जिसने मुँह फेरा और कुफ़्र किया।

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मेरा चिंतन
88:24पृष्ठ 592 · जुज़ 30

فَيُعَذِّبُهُ ٱللَّهُ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَكْبَرَ ۝٢٤

तो अल्लाह उसे सबसे बड़ी यातना देगा।

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88:25पृष्ठ 592 · जुज़ 30

إِنَّ إِلَيْنَآ إِيَابَهُمْ ۝٢٥

निःसंदेह हमारी ही ओर उनका लौटकर आना है।

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88:26पृष्ठ 592 · जुज़ 30

ثُمَّ إِنَّ عَلَيْنَا حِسَابَهُم ۝٢٦

फिर बेशक हमारे ही ज़िम्मे उनका ह़िसाब लेना है।[4]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[4] (21-26) इन आयतों का भावार्थ यह है कि क़ुरआन किसी को बलपूर्वक मनवाने के लिए नहीं है, और न नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कर्तव्य है कि किसी को बलपूर्वक मनवाएँ। आप जिससे डरा रहे हैं, ये मानें या न मानें, वह खुली बात है। फिर भी जो नहीं सुनते उनको अल्लाह ही समझेगा। ये और इस जैसी क़ुरआन की अनेक आयतें इस आरोप का खंडन करती हैं कि इस्लाम ने अपने मनवाने के लिए अस्त्र शस्त्र का प्रयोग किया है।
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Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari
Translated by Azizul Haq Al-Omari.
स्रोत संस्करण: 1.1.5 · 2025-08-05

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