सूरह 83 · 36 आयतें · मक्की

Al-Mutaffifin

अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन

المطففين
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83:1पृष्ठ 587 · जुज़ 30

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَيْلٌ لِّلْمُطَفِّفِينَ ۝١

विनाश है नाप-तौल में कमी करने वालों के लिए।

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मेरा चिंतन
83:2पृष्ठ 587 · जुज़ 30

ٱلَّذِينَ إِذَا ٱكْتَالُوا۟ عَلَى ٱلنَّاسِ يَسْتَوْفُونَ ۝٢

वे लोग कि जब लोगों से नापकर लेते हैं, तो पूरा लेते हैं।

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मेरा चिंतन
83:3पृष्ठ 587 · जुज़ 30

وَإِذَا كَالُوهُمْ أَو وَّزَنُوهُمْ يُخْسِرُونَ ۝٣

और जब उन्हें नापकर या तौलकर देते हैं, तो कम देते हैं।

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मेरा चिंतन
83:4पृष्ठ 587 · जुज़ 30

أَلَا يَظُنُّ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَنَّهُم مَّبْعُوثُونَ ۝٤

क्या वे लोग विश्वास नहीं रखते कि वे (मरने के बाद) उठाए जाने वाले हैं?

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मेरा चिंतन
83:5पृष्ठ 587 · जुज़ 30

لِيَوْمٍ عَظِيمٍ ۝٥

एक बहुत बड़े दिन के लिए।

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मेरा चिंतन
83:6पृष्ठ 587 · जुज़ 30

يَوْمَ يَقُومُ ٱلنَّاسُ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ۝٦

जिस दिन लोग सर्व संसार के पालनहार के सामने खड़े होंगे।[1]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[1] (1-6) इस सूरत की प्रथम छह आयतों में इसी व्यवसायिक विश्वास घात पर पकड़ की गई है कि न्याय तो यह है कि अपने लिए अन्याय नहीं चाहते, तो दूसरों के साथ न्याय करो। और इस रोग का निवारण अल्लाह के भय तथा परलोक पर विश्वास ही से हो सकता है। क्योंकि इस स्थिति में अमानतदारी एक नीति ही नहीं, बल्कि धार्मिक कर्तव्य होगा औ इस पर स्थित रहना लाभ तथा हानि पर निर्भर नहीं रहेगा।
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मेरा चिंतन
83:7पृष्ठ 588 · जुज़ 30

كَلَّآ إِنَّ كِتَـٰبَ ٱلْفُجَّارِ لَفِى سِجِّينٍ ۝٧

हरगिज़ नहीं, निःसंदेह दुराचारियों का कर्म-पत्र "सिज्जीन" में है।

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मेरा चिंतन
83:8पृष्ठ 588 · जुज़ 30

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا سِجِّينٌ ۝٨

और तुम क्या जानो कि 'सिज्जीन' क्या है?

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मेरा चिंतन
83:9पृष्ठ 588 · जुज़ 30

كِتَـٰبٌ مَّرْقُومٌ ۝٩

वह एक लिखित पुस्तक है।

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मेरा चिंतन
83:10पृष्ठ 588 · जुज़ 30

وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ۝١٠

उस दिन झुठलाने वालों के लिए विनाश है।

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मेरा चिंतन
83:11पृष्ठ 588 · जुज़ 30

ٱلَّذِينَ يُكَذِّبُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ ۝١١

जो बदले के दिन को झुठलाते हैं।

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मेरा चिंतन
83:12पृष्ठ 588 · जुज़ 30

وَمَا يُكَذِّبُ بِهِۦٓ إِلَّا كُلُّ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ ۝١٢

तथा उसे केवल वही झुठलाता है, जो सीमा का उल्लंघन करने वाला, बड़ा पापी है।

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मेरा चिंतन
83:13पृष्ठ 588 · जुज़ 30

إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ءَايَـٰتُنَا قَالَ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ۝١٣

जब उसके सामने हमारी आयतों को पढ़ा जाता है, तो कहता है : यह पहले लोगों की कहानियाँ हैं।

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मेरा चिंतन
83:14पृष्ठ 588 · जुज़ 30

كَلَّا ۖ بَلْ ۜ رَانَ عَلَىٰ قُلُوبِهِم مَّا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ ۝١٤

हरगिज़ नहीं, बल्कि जो कुछ वे कमाते थे, वह ज़ंग बनकर उनके दिलों पर छा गया है।

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मेरा चिंतन
83:15पृष्ठ 588 · जुज़ 30

كَلَّآ إِنَّهُمْ عَن رَّبِّهِمْ يَوْمَئِذٍ لَّمَحْجُوبُونَ ۝١٥

हरगिज़ नहीं, निश्चय वे उस दिन अपने पालनहार (के दर्शन) से रोक दिए जाएँगे।

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मेरा चिंतन
83:16पृष्ठ 588 · जुज़ 30

ثُمَّ إِنَّهُمْ لَصَالُوا۟ ٱلْجَحِيمِ ۝١٦

फिर निःसंदेह वे अवश्य जहन्नम में प्रवेश करने वाले हैं।

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मेरा चिंतन
83:17पृष्ठ 588 · जुज़ 30

ثُمَّ يُقَالُ هَـٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ ۝١٧

फिर कहा जाएगा : यही है, जिसे तुम झुठलाया करते थे।[2]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[2] (7-17) इन आयतों में कुकर्मियों के दुष्परिणाम का विवरण दिया गया है। तथा यह बताया गया है कि उनके कुकर्म पहले ही से अपराध पत्रों में अंकित किए जा रहे हैं। तथा वे परलोक में कड़ी यातना का सामना करेंगे। और नरक में झोंक दिए जाएँगे। "सिज्जीन" से अभिप्राय, एक जगह है जहाँ पर काफ़िरों, अत्याचारियों और मुश्रिकों के कुकर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किए जाते हैं। दिलों का लोहमल, पापों की कालिमा को कहा गया है। पाप अंतरात्मा को अंधकार बना देते हैं, तो सत्य को स्वीकार करने की स्वभाविक योग्यता खो देते हैं।
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83:18पृष्ठ 588 · जुज़ 30

كَلَّآ إِنَّ كِتَـٰبَ ٱلْأَبْرَارِ لَفِى عِلِّيِّينَ ۝١٨

हरगिज़ नहीं, निःसंदेह नेक लोगों का कर्म-पत्र निश्चय "इल्लिय्यीन" में है।

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83:19पृष्ठ 588 · जुज़ 30

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا عِلِّيُّونَ ۝١٩

और तुम क्या जानो कि 'इल्लिय्यीन' क्या है?

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मेरा चिंतन
83:20पृष्ठ 588 · जुज़ 30

كِتَـٰبٌ مَّرْقُومٌ ۝٢٠

वह एक लिखित पुस्तक है।

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मेरा चिंतन
83:21पृष्ठ 588 · जुज़ 30

يَشْهَدُهُ ٱلْمُقَرَّبُونَ ۝٢١

जिसके पास समीपवर्ती (फरिश्ते) उपस्थित रहते हैं।

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मेरा चिंतन
83:22पृष्ठ 588 · जुज़ 30

إِنَّ ٱلْأَبْرَارَ لَفِى نَعِيمٍ ۝٢٢

निःसंदेह नेक लोग बड़ी नेमत (आनंद) में होंगे।

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मेरा चिंतन
83:23पृष्ठ 588 · जुज़ 30

عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ ۝٢٣

तख़्तों पर (बैठे) देख रहे होंगे।

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83:24पृष्ठ 588 · जुज़ 30

تَعْرِفُ فِى وُجُوهِهِمْ نَضْرَةَ ٱلنَّعِيمِ ۝٢٤

तुम उनके चेहरों पर नेमत की ताज़गी का आभास करोगे।

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83:25पृष्ठ 588 · जुज़ 30

يُسْقَوْنَ مِن رَّحِيقٍ مَّخْتُومٍ ۝٢٥

उन्हें मुहर लगी शुद्ध शराब पिलाई जाएगी।

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83:26पृष्ठ 588 · जुज़ 30

خِتَـٰمُهُۥ مِسْكٌ ۚ وَفِى ذَٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ ٱلْمُتَنَـٰفِسُونَ ۝٢٦

उसकी मुहर कस्तूरी की होगी। अतः प्रतिस्पर्धा करने वालों को इसी (की प्राप्ति) के लिए प्रतिस्पर्धा करना चाहिए।

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मेरा चिंतन
83:27पृष्ठ 588 · जुज़ 30

وَمِزَاجُهُۥ مِن تَسْنِيمٍ ۝٢٧

उसमें 'तसनीम' की मिलावट होगी।

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83:28पृष्ठ 588 · जुज़ 30

عَيْنًا يَشْرَبُ بِهَا ٱلْمُقَرَّبُونَ ۝٢٨

वह एक स्रोत है, जिससे समीपवर्ती लोग पिएँगे।[3]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[3] (18-28) इन आयतों में बताया गया है कि सदाचारियों के कर्म ऊँचे पत्रों में अंकित किए जा रहे हैं जो फ़रिश्तों के पास सुरक्षित हैं। और वे स्वर्ग में सुख के साथ रहेंगे। "इल्लिय्यीन" से अभिप्राय, जन्नत में एक जगह है। जहाँ पर नेक लोगों के कर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किए जाते हैं। वहाँ पर समीपवर्ती फ़रिश्ते उपस्थित रहते हैं।
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83:29पृष्ठ 588 · जुज़ 30

إِنَّ ٱلَّذِينَ أَجْرَمُوا۟ كَانُوا۟ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يَضْحَكُونَ ۝٢٩

निःसंदेह जो लोग अपराधी हैं, वे (दुनिया में) ईमान लाने वालों पर हँसा करते थे।

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83:30पृष्ठ 588 · जुज़ 30

وَإِذَا مَرُّوا۟ بِهِمْ يَتَغَامَزُونَ ۝٣٠

और जब वे उनके पास से गुज़रते, तो आपस में आँखों से इशारे किया करते थे।

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मेरा चिंतन
83:31पृष्ठ 588 · जुज़ 30

وَإِذَا ٱنقَلَبُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمُ ٱنقَلَبُوا۟ فَكِهِينَ ۝٣١

और जब अपने घर वालों की ओर लौटते, तो (मोमिनों के परिहास का) आनंद लेते हुए लौटते थे।

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83:32पृष्ठ 588 · जुज़ 30

وَإِذَا رَأَوْهُمْ قَالُوٓا۟ إِنَّ هَـٰٓؤُلَآءِ لَضَآلُّونَ ۝٣٢

और जब वे उन (मोमिनों) को देखते, तो कहते थे : निःसंदेह ये लोग निश्चय भटके हुए हैं।

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83:33पृष्ठ 588 · जुज़ 30

وَمَآ أُرْسِلُوا۟ عَلَيْهِمْ حَـٰفِظِينَ ۝٣٣

हालाँकि वे उनपर निरीक्षक बनाकर नहीं भेजे गए थे।

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मेरा चिंतन
83:34पृष्ठ 588 · जुज़ 30

فَٱلْيَوْمَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنَ ٱلْكُفَّارِ يَضْحَكُونَ ۝٣٤

तो आज वे लोग जो ईमान लाए, काफ़िरों पर हँस रहे हैं।

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83:35पृष्ठ 589 · जुज़ 30

عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ ۝٣٥

तख़्तों पर बैठे देख रहे हैं।

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83:36पृष्ठ 589 · जुज़ 30

هَلْ ثُوِّبَ ٱلْكُفَّارُ مَا كَانُوا۟ يَفْعَلُونَ ۝٣٦

क्या काफ़िरों को उसका बदला मिल गया, जो वे किया करते थे?[4]

अनुवाद टिप्पणियाँ
[4] (29-36) इन आयतों में बताया गया है कि परलोक में कर्मों का फल दिया जाएगा, तो सांसारिक परिस्थितियाँ बदल जाएँगी। संसार में तो सब के लिए अल्लाह की दया है, परंतु न्याय के दिन जो अपने सुख सुविधा पर गर्व करते थे और जिन निर्धन मुसलमानों को देखकर आँखें मारते थे, वहाँ पर वही उनके दुष्परिणाम को देख कर प्रसन्न होंगे। अंतिम आयत में विश्वासहीनों के दुष्परिणाम को उनका कर्म कहा गया है। जिसमें यह संकेत है कि अच्छा फल और कुफल स्वयं इमसान के अपने कर्मों का स्वभाविक प्रभाव होगा।
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